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गीता के काल निर्धारण पर विस्तार से लिखिए।

परिचय

भगवद्गीता हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता तो है ही, परंतु इसका काल निर्धारण (Time Period Determination) एक जटिल और बहुपरतीय विषय है। इतिहासकारों और विद्वानों ने इसके समय निर्धारण को लेकर विभिन्न विचार प्रस्तुत किए हैं। इस उत्तर में हम गीता के रचनाकाल के बारे में विस्तार से जानेंगे।

महाभारत के संदर्भ में गीता का स्थान

भगवद्गीता, महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है। इसे श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर हुए संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए गीता का समय निर्धारण महाभारत के समय निर्धारण से जुड़ा हुआ है।

महाभारत का संभावित काल

अनेक विद्वानों ने महाभारत युद्ध को लगभग 3100 ईसा पूर्व का बताया है। कुछ इसे 1500 ईसा पूर्व या इससे भी बाद का मानते हैं। इस प्रकार, यदि गीता को महाभारत का हिस्सा मानें, तो उसका काल भी ईसा पूर्व के प्रथम सहस्राब्दी में आता है।

गीता की रचना का ऐतिहासिक विश्लेषण

कुछ आधुनिक विद्वानों का मत है कि भगवद्गीता की रचना महाभारत की मूल कथा के बहुत बाद में की गई थी। उनके अनुसार यह लगभग 5वीं से 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच लिखी गई। इस तर्क का आधार गीता में व्यक्त दार्शनिक विचार हैं जो उपनिषदों और अन्य दर्शनों से प्रभावित माने जाते हैं।

दार्शनिक पृष्ठभूमि और समय निर्धारण

गीता में सांख्य, योग, वेदांत, और भक्तियोग की गूढ़ व्याख्या है। यह संकेत करता है कि गीता की रचना ऐसे समय में हुई जब भारतीय दर्शन परिपक्व हो चुका था। इससे अनुमान लगाया गया कि इसकी रचना उपनिषदों के बाद हुई होगी, जो लगभग 800-500 ईसा पूर्व के बीच रचे गए थे।

गीता में वर्णित सामाजिक संकेत

गीता में वर्णाश्रम धर्म, कर्म सिद्धांत, आत्मा और मोक्ष की बातें आती हैं। ये विचार वैदिक परंपरा के बाद के माने जाते हैं। इससे भी गीता को उत्तर वैदिक काल का ग्रंथ माना गया है।

गीता और बुद्ध धर्म का प्रभाव

कुछ विद्वान गीता की तुलना बौद्ध धर्म की शिक्षाओं से करते हैं और मानते हैं कि इसकी रचना बुद्ध के बाद हुई होगी। यदि यह तर्क स्वीकार किया जाए, तो गीता को 3री से 2री शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है।

गीता के काल निर्धारण में विविधता

निष्कर्ष

गीता का काल निर्धारण एक बहस का विषय रहा है। पारंपरिक दृष्टिकोण इसे बहुत प्राचीन मानता है, जबकि आधुनिक विद्वान इसे बाद के समय की रचना मानते हैं। हालांकि, इसका काल चाहे जो भी हो, इसकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और जीवन को दिशा देने वाली हैं।

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