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गीता में पर्यावरण विज्ञान के तत्वों पर विस्तृत लेख लिखिए।

परिचय

भगवद्गीता न केवल एक धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह जीवन का दर्शन और व्यवहारिक विज्ञान भी प्रस्तुत करती है। इसमें पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की प्रेरणा मिलती है। गीता में अनेक ऐसे श्लोक हैं जो हमें पर्यावरण संतुलन, प्रकृति के महत्व और उसके संरक्षण के लिए प्रेरित करते हैं। इस लेख में हम गीता में निहित पर्यावरण विज्ञान के तत्वों पर विचार करेंगे।

प्रकृति की महत्ता

गीता में प्रकृति को एक सजीव सत्ता के रूप में देखा गया है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि:

“मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन गर्भं दधाम्यहम्।”
– गीता 14.3

इस श्लोक में प्रकृति को ‘ब्रह्म’ कहा गया है, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति होती है।

पंचमहाभूत और पर्यावरण

गीता में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को सृष्टि के मूल तत्व बताया गया है। इनका संतुलन ही जीवन का आधार है। श्रीकृष्ण कहते हैं:

“भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।”
– गीता 7.4

इन तत्वों के माध्यम से भगवान स्वयं प्रकृति में व्याप्त हैं।

यज्ञ और पर्यावरण संतुलन

गीता में यज्ञ की परिकल्पना केवल अग्निहोत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित व्यवहार को भी यज्ञ माना गया है।

निष्काम कर्म और प्रकृति

गीता का निष्काम कर्म सिद्धांत कहता है कि हम बिना किसी स्वार्थ के प्रकृति की सेवा करें। इसका आशय है कि हम प्रकृति से आवश्यकता अनुसार लें और उसका शोषण न करें।

प्रकृति और आत्मा का संबंध

श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रकृति और आत्मा दोनों अनादि हैं। जब तक आत्मा शरीर में है, तब तक उसे प्रकृति के तत्वों के साथ संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

पर्यावरणीय शिक्षाएँ

आधुनिक संदर्भ में गीता का संदेश

आज जब प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का संकट बढ़ रहा है, तो गीता का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें पर्यावरण के साथ समरसता और संतुलन बनाए रखने का आग्रह करता है।

निष्कर्ष

गीता केवल अध्यात्म का ग्रंथ नहीं, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण का भी मार्गदर्शन देती है। इसके सिद्धांत हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही जीवन का सच्चा मार्ग है। यदि हम गीता की पर्यावरणीय शिक्षाओं को अपनाएँ, तो मानव और प्रकृति दोनों का कल्याण संभव है।

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