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शंकर एवं विष्णु पर विस्तृत लेख लिखिए।

परिचय

भारतीय धर्म और संस्कृति में शंकर (महादेव) और विष्णु दो प्रमुख देवता हैं जो ब्रह्मांड की संचालन शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। शंकर विनाश और तपस्या के देवता हैं, जबकि विष्णु पालन और संतुलन के रक्षक हैं। दोनों देवों की उपासना सम्पूर्ण भारतवर्ष में होती है और गीता सहित अनेक शास्त्रों में इनकी महिमा का वर्णन है।

भगवान शंकर का स्वरूप

भगवान विष्णु का स्वरूप

शंकर और विष्णु का परस्पर संबंध

हालांकि शंकर और विष्णु दो भिन्न कार्यों के प्रतीक हैं, लेकिन दोनों ब्रह्म की अभिव्यक्ति हैं। शिव विष्णु के भक्त हैं और विष्णु शिव के। अनेक पुराणों में दोनों के परस्पर पूजन की कथाएँ मिलती हैं।

उदाहरण – हरिहर रूप, जिसमें शिव और विष्णु एक शरीर के दो भाग होते हैं, इस समन्वय का प्रमाण है।

गीता में दोनों की महिमा

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा कि वे समस्त देवों में श्रेष्ठ हैं और सभी देवताओं की शक्तियाँ उन्हीं में समाहित हैं। विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं गीता में उपस्थित हैं, और शिव को भी परम ज्ञानी योगियों द्वारा ध्यान में रखा जाता है।

शंकर और विष्णु की उपासना

आधुनिक संदर्भ में महत्व

आज के युग में जहाँ असंतुलन और अराजकता बढ़ रही है, शिव और विष्णु दोनों का संतुलित आदर्श अपनाना आवश्यक है – शिव से विवेक, नियंत्रण और त्याग सीखें, तो विष्णु से कर्तव्य, सेवा और धैर्य।

निष्कर्ष

शंकर और विष्णु का स्वरूप भारतीय अध्यात्म का मूल आधार है। ये केवल देव नहीं, बल्कि जीवन के दो आवश्यक सिद्धांत हैं – त्याग और पालन। गीता के सिद्धांतों के अनुसार, इन दोनों के गुणों को अपनाकर मनुष्य जीवन को सफल और संतुलित बना सकता है।

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