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गीता के अनुसार सम्पूर्ण गुणात्मक स्वरूप पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

परिचय

भगवद्गीता एक ऐसा अद्वितीय ग्रंथ है जो न केवल धार्मिक और दार्शनिक ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि व्यक्ति के सम्पूर्ण गुणात्मक स्वरूप (Holistic Qualitative Nature) को भी परिभाषित करता है। गीता में मनुष्य के तीन गुणों – सत, रज और तम – के माध्यम से सम्पूर्ण व्यक्तित्व की व्याख्या की गई है।

त्रिगुण – गुणात्मक स्वरूप का आधार

सम्पूर्ण गुणात्मक स्वरूप का अर्थ

गीता कहती है कि हर व्यक्ति में ये तीनों गुण होते हैं, लेकिन उनका अनुपात अलग-अलग होता है। सम्पूर्ण गुणात्मक स्वरूप का अर्थ है – इन गुणों का संतुलित विकास और सत्त्वगुण की ओर उन्नति।

व्यक्तित्व निर्माण में गुणों की भूमिका

गीता की दृष्टि से श्रेष्ठ गुणात्मक जीवन

श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि सत्त्वगुण ही मोक्ष का मार्ग है। एक सच्चा साधक वही है जो रज और तम से ऊपर उठकर सत्त्व को अपनाता है।

गुणों के अनुसार कर्म और आचरण

गुणात्मक स्वरूप में परिवर्तन कैसे लाएँ?

निष्कर्ष

गीता के अनुसार सम्पूर्ण गुणात्मक स्वरूप वही है जिसमें सत्त्वगुण की प्रधानता हो, रजस को सही दिशा दी जाए और तमस को नियंत्रित किया जाए। यह संतुलन ही मनुष्य को आत्मज्ञान, शांति और मोक्ष की ओर ले जाता है।

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