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गीता में अवतार की संकल्पना को विस्तार से स्पष्ट कीजिए।

परिचय

भगवद्गीता में ‘अवतार’ की संकल्पना एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और दार्शनिक विषय है। गीता के चौथे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने अवतार के उद्देश्य और कारणों को स्पष्ट करते हैं। अवतार का अर्थ होता है – भगवान का धरती पर किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु जन्म लेना।

अवतार की परिभाषा

‘अवतार’ का शाब्दिक अर्थ है – ऊपर से नीचे उतरना। जब परमात्मा किसी विशेष काल, स्थान और परिस्थिति में लोक-कल्याण और धर्म की रक्षा के लिए स्वयं धरती पर आते हैं, तो उसे अवतार कहा जाता है।

गीता में अवतार की घोषणा

श्रीकृष्ण गीता के अध्याय 4, श्लोक 7 और 8 में कहते हैं –

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।”

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्,
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।”

इन श्लोकों के माध्यम से श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब-तब वे अवतार लेते हैं।

अवतार के उद्देश्य

अवतार का स्वरूप

गीता के अनुसार, भगवान अवतार लेते हैं लेकिन उनका जन्म और कर्म सामान्य मानव की तरह नहीं होता। वे दिव्य होते हैं।

अवतार और कर्म

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि वे कर्म करते हैं लेकिन वे कर्म उन्हें बाँधते नहीं। उनका हर कार्य लोक-कल्याण के लिए होता है, न कि किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए।

अवतार की आवश्यकता

जब समाज में अन्याय, भ्रष्टाचार, हिंसा और अधर्म की वृद्धि होती है, तब जनता को मार्गदर्शन और सुरक्षा की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में अवतार लोकमंगल के लिए प्रकट होते हैं।

अवतार का प्रभाव

आधुनिक युग में अवतार की संकल्पना

आज भी जब समाज में अत्याचार और अधर्म बढ़ता है, तब यह विश्वास बना रहता है कि ईश्वर किसी रूप में हमारी रक्षा के लिए आएंगे। यह संकल्पना न केवल धार्मिक, बल्कि मानसिक और सामाजिक विश्वास की नींव भी है।

निष्कर्ष

गीता में अवतार की संकल्पना यह दर्शाती है कि ईश्वर कभी भी अपने भक्तों को अकेला नहीं छोड़ते। जब अधर्म हावी हो जाता है, तब वह स्वयं अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं। यह विश्वास हमें साहस, प्रेरणा और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति देता है।

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