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विश्व एवं मानवता पर प्रकाश डालिए।

परिचय भगवद्गीता केवल आध्यात्मिकता की बात नहीं करती, बल्कि यह समग्र जीवन दर्शन प्रस्तुत करती है जिसमें ‘विश्व’ और ‘मानवता’ की भावना का गहरा समावेश है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए है। यह उपदेश हमें विश्व की एकता और मानवता के कल्याण […]

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गीता के अनुसार भगवान की सर्वव्यापकता के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।

परिचय भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को न केवल धर्म और कर्म का उपदेश दिया, बल्कि अपने ‘सर्वव्यापक’ स्वरूप को भी स्पष्ट किया। यह स्वरूप दर्शाता है कि भगवान केवल एक स्थान, एक मूर्ति या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। सर्वव्यापकता का अर्थ ‘सर्वव्यापकता’ का अर्थ

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अप्रकट एवं प्रकृति पर विस्तृत से लिखिए।

परिचय भगवद्गीता में अप्रकट (अव्यक्त) और प्रकृति (प्रकृत) की अवधारणाओं को गहराई से प्रस्तुत किया गया है। यह दोनों ही तत्व सृष्टि की संरचना, आत्मा की स्थिति और ईश्वर की भूमिका को समझने में सहायक हैं। इस लेख में हम गीता के अनुसार ‘अप्रकट’ और ‘प्रकृति’ के स्वरूप को विस्तार से समझेंगे। प्रकृति का अर्थ

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गीता के अनुसार पूज्य के स्वरूप पर विस्तृत लेख लिखिए।

परिचय भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जीवन के प्रत्येक पक्ष को स्पष्ट रूप से समझाया है। ‘पूज्य’ का अर्थ होता है – जो पूजनीय हो, अर्थात् जिसे आदर, श्रद्धा और समर्पण के साथ पूजा जाए। गीता में पूज्य के स्वरूप की चर्चा करते समय श्रीकृष्ण ने बताया कि ईश्वर ही सर्वपूज्य है, क्योंकि वह सर्वव्यापी, सर्वज्ञ

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गीता में ज्ञान-विज्ञान के स्वरूप को विस्तृत रूप से स्पष्ट कीजिए।

परिचय भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन देने वाला दिव्य ग्रंथ है। इसमें ज्ञान और विज्ञान – दोनों के स्वरूप की चर्चा की गई है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान और विज्ञान का ऐसा समन्वित रूप समझाया जो आत्मा, परमात्मा और संसार की सच्चाई को उजागर करता है। इस

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MBG-003: कर्मसंन्यास-आत्मसंयम एवं ज्ञानविज्ञान – Assignment Answers

MBG-003 Assignment: सभी उत्तरों की लिंक यहाँ पर MBG-003 (कर्मसंन्यास-आत्मसंयम एवं ज्ञानविज्ञान) पाठ्यक्रम के सभी प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। प्रत्येक उत्तर सरल भाषा में और 600+ शब्दों में लिखा गया है ताकि विद्यार्थी इसे आसानी से समझ सकें। गीता में कर्मसंन्यास के अभिप्राय पर विस्तार से लेख लिखिए। गीता में एकात्ममनस्वभाव पर विस्तार

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गीता में आत्मनियंत्रण की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।

परिचय भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की श्रेष्ठ कला सिखाने वाला दर्शन है। इसमें आत्मनियंत्रण या आत्मसंयम को आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक बताया गया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध भूमि में आत्मनियंत्रण की आवश्यकता समझाई, जो आज के हर मानव के लिए भी उतनी ही

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गीता के अनुसार लोकव्यवहार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

परिचय भगवद्गीता केवल आध्यात्मिक या धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक जीवन-दर्शन भी है। इसमें न केवल आत्मा और परमात्मा की बात होती है, बल्कि दैनिक जीवन और समाज में किस प्रकार आचरण करना चाहिए – इसका भी विस्तृत मार्गदर्शन मिलता है। गीता के अनुसार ‘लोकव्यवहार’ का अर्थ है – समाज में रहते हुए

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गीता के अनुसार ध्यानयोग पर प्रकाश डालिए।

परिचय भगवद्गीता में ध्यानयोग एक महत्वपूर्ण मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य आत्म-शुद्धि, आत्मज्ञान और परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति कर सकता है। यह मार्ग मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति और मोक्ष की दिशा में साधक को अग्रसर करता है। ध्यानयोग विशेष रूप से गीता के छठे अध्याय में विस्तार से वर्णित है। ध्यानयोग की परिभाषा ‘ध्यान’

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गीता के अनुसार कर्मसंन्यास के भाव को स्पष्ट कीजिए।

परिचय भगवद्गीता में कर्मसंन्यास का विचार गूढ़ और गहन रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह केवल बाहरी कर्मों के त्याग की बात नहीं करता, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा के स्तर पर कर्म से जुड़े अहंकार, इच्छा और फल की अपेक्षा के त्याग की बात करता है। गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है

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